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"गुरू बिन मोक्ष नहीं"
दोस्तों आज के इस blog में हम बात करेंगे पूर्ण गुरु के विषय में।
हमे गुरु बनाने की क्या आवश्यकता है??
क्या गुरु के बिना मोक्ष नहीं मिलता??
आज के युग में सच्चा सतगुरु कोन है??
इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको मेरे इस blog में अवश्य मिलेंगे।
1. हमे गुरु बनाने की क्या आवश्यकता है?
प्रश्न:-क्या गुरु के बिना भक्ति नहीं कर सकते?
उत्तर:- भक्ति कर सकते है,परन्तु व्यर्थ प्रयत्न रहेगा।
प्रश्न :- कारण बताऐं?
उत्तर :- परमात्मा का विधान है जो सूक्ष्मवेद में कहा है :-
कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान। गुरू बिन दोंनो निष्फल है, पूछो वेद पुराण।। कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरू कीन्ह। तीन लोक के वे धनी, गुरू आगे आधीन।। कबीर, राम कृष्ण बड़े तिन्हूं पुर राजा। तिन गुरू बन्द कीन्ह निज काजा।।
भावार्थ :- गुरू धारण किए बिना यदि नाम जाप की माला फिराते हैं और दान देते हैं, वे दोनों व्यर्थ हैं। यदि आप जी को संदेह हो तो अपने वेदों तथा पुराणों में प्रमाण देखें।
श्रीमद् भगवत गीता चारों वेदों का सारांश है। गीता अध्याय 2 श्लोक 7 मेंअर्जुन ने कहा कि हे श्री कृष्ण! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ।
गीताअध्याय 4 श्लोक 3 में श्री कृष्ण जी में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने अर्जुन से कहाकि तू मेरा भक्त है।
पुराणों में प्रमाण है कि श्री रामचन्द्र जी ने ऋषि वशिष्ठ जी
से नाम दीक्षा ली थी और अपने घर व राज-काज में गुरू वशिष्ठ जी की आज्ञा लेकर कार्य करते थे।
श्री कृष्ण जी ने ऋषि संदीपनि जी से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया तथा श्री कृष्ण जी के आध्यात्मिक गुरू श्री दुर्वासा ऋषि जी थे।
कबीर परमेश्वर जी हमें समझाना चाहते हैं कि आप जी श्री राम तथा श्रीकृष्ण जी से तो किसी को बड़ा अर्थात् समर्थ नहीं मानते हो। वे तीन लोक केमालिक थे, उन्होंने भी गुरू बनाकर अपनी भक्ति की, मानव जीवन सार्थक किया।
इससे सहज में ज्ञान हो जाना चाहिए कि अन्य व्यक्ति यदि गुरू के बिना भक्ति करता है तो कितना सही है? अर्थात् व्यर्थ है।
गुरू के बिना देखा-देखी कही-सुनी भक्ति को लोकवेद के अनुसार
भक्ति कहते हैं। लोकवेद का अर्थ है, किसी क्षेत्रा में प्रचलित भक्ति का ज्ञान जो तत्वज्ञानके विपरीत होता है।
कबीर परमेश्वर जी ने सूक्ष्म वेद में कहा है :-
कबीर, पीछे लाग्या जाऊं था, मैं लोक वेद के साथ। रास्ते में सतगुरू मिले, दीपक दीन्हा हाथ।।
भावार्थ है कि साधक लोकवेद अर्थात् दन्त कथा के आधार से भक्ति कर रहा था। उस शास्त्राविरूद्ध साधना के मार्ग पर चल रहा था।
रास्ते में अर्थात् भक्ति मार्गमें एक दिन तत्वदर्शी सन्त मिल गए। उन्होंने शास्त्राविधि अनुसार शास्त्रा प्रमाणित साधना रूपी दीपक दे दिया अर्थात् सत्य शास्त्रानुकूल साधना का ज्ञान कराया तो
जीवन नष्ट होने से बच गया। सतगुरू द्वारा बताये तत्वज्ञान की रोशनी में पताचला कि मैं गलत भक्ति कर रहा था।
Geeta sar
श्री मद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23. और 24 में कहा है कि शास्त्रा विधि को त्यागकर जो साधक मनमाना आचरण करते हैं, उनको न तो सुख होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है और न ही गति अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति होती है अर्थात् व्यर्थ साधना है।
फिर गीता अध्याय 16 श्लोक 24 में कहा
कि अर्जुन! इससे तेरे लिए कृर्तव्य और अकृर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्रा ही प्रमाण हैं।
जो साधना पूरा हिन्दू समाज कर रहा है, वह सब गीता-वेदों में वर्णित न होने से शास्त्र विरूद्ध साधना हुई जो व्यर्थ है।
कबीर, गुरु बिन काहु न पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुस छडे़ मूढ़ किसाना।
कबीर, गुरू बिन वेद पढै़ जो प्राणी, समझै न सार रहे अज्ञानी।।
इसलिए गुरू जी से वेद शास्त्रों का ज्ञान पढ़ना चाहिए जिससे सत्य भक्ति की शास्त्रानुकूल साधना करके मानव जीवन धन्य हो जाए।
इस blog को पढ़कर अब आपको यह तो पता चल गया होगा की गुरु की आवश्यकता क्यों है और गुरु के बिना मोक्ष हो सकता है या नहीं।
आजके समय में सबसे बड़ा यह प्रश्न बन गया है कि सच्चा गुरु कोंन है?
क्योंकि सभी धर्म के अलग अलग गुरु है और वो नकली है। आखिर वो सतगुरु कोन है जिससे नाम दीक्षा लेने से पूर्ण मोक्ष प्राप्त होगा।
गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा है कि जो तत्वज्ञान परमात्मा स्वयं बताता है। उसको उसके कृपा पात्रा सन्त ही समझते हैं। उस तत्वज्ञान को तू तत्वदर्शी सन्तों के पास जाकर समझ।
उनको दण्डवत् प्रणाम कर और नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वे तत्वदर्शी सन्त तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे।
परमेश्वर ने यह तत्वज्ञान स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर बताया था।
Tatvdarshi sant
गीताअध्याय15 श्लोक 1 में तत्वदर्शी सन्त की पहचान बताई है कि जो सन्त संसार रूपी उलटे लटके हुए वृक्ष को मूल (जड़) से लेकर सर्व अंगों को जानता है, वह तत्वदर्शी सन्त है।
आज के समय में संत रामपाल जी महाराज के अलावा विश्व में कोई और सतगरु नहीं है। क्योंकि संत रामपाल जी महाराज ने संसार रूपी उलटे लटके हुए वृक्ष के सर्व अंगों को प्रमाण के साथ बता दिया।
हमारा प्रश्न है कि गुरु के बिना मोक्ष नहीं मिलता? इसका उत्तर है नहीं।
क्योंकि गुरु वो है जो हमे मोक्ष प्राप्त करने के मंत्र देता है। और इस लोक में भी सुख प्राप्त कराता है।
गुरु ही हमे शास्त्र अनुकूल साधना बताता है जिससे हमें सुख प्राप्त होते है और पूर्ण मोक्ष प्राप्त होता है।
कबीर परमेश्वर अपनी वाणी में कहते है कि,
गुरु बड़े गोविंद से मन में देख विचार। हरि सुमरे सो वार है गुरु सुमरे होय पार।।
इसका अर्थ है कि भगवान से गुरु बड़ा होता है। और गुरु के बताए अनुसार भक्ति करने से पार हो जाते है।
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सही बात है भगत जी जीवन को सफल बनाने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है जैसे शिक्षा के स्तर पर अपने सभी विषयों मे सफल होने के लिए गुरु बनाना ही पड़ता है
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